Don't Miss
Home » देश » क्या खत्म हो रहा है मोदी का आकर्षण

क्या खत्म हो रहा है मोदी का आकर्षण

विकल्प शर्मा
नई दिल्ली। अगले लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, क्या यह अभी से साफ दिख रहा है? भाजपा की अगुवाई वाला एनडीए अपनी मौजूदा अजेय छवि को बरकरार रखते हुए 2014 की जीत को 2019 में भी दोहरा पाएगा? उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद नेशनल काॅन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने एक ट्वीट किया थाः ‘‘इस तरह तो हमें 2019 को भूल जाना चाहिए और 2024 से ही कुछ उम्मीद रखते हुए उसकी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।’’ आम मानस भी उमर अब्दुल्ला वाला राग ही अलाप रहा है।क्या कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए महागठबंधन, सच में आकार ले सका तो, 2019 में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के चुनावी वर्चस्व को चुनौती दे पाएगा? इस प्रश्न का उत्तर तो 2015 के बाद से ही विपक्ष की ऊंची आकांक्षाओं और गहरी निराशा के बीच झूल रहा है।

दिल्ली और फिर बिहार में भाजपा की हार के बाद इस विचार ने आकार लेना शुरू किया था। 1977 के बाद से ही देश में राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधनों का लंबा इतिहास रहा है पर किसी मुख्य राष्ट्रीय दल से टक्कर लेने को राज्य स्तरीय महागठबंधन का विचार एकदम नया था। अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति करने वाले बिहार के धुर विरोधियों, जनता दल (यूनाइटेट) के नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के मुखिया लालू प्रसाद गले मिले। दोस्ती के इस असर को और गहरा करने के लिए कांग्रेस भी साथ आ खड़ी चुनाव में ममता बनर्जी की प्रचंड जीत से इस विचार को और बल मिला।

एक बातचीत में लालू प्रसाद ने आशा से दमकते चेहरे के साथ गर्वीले अंदाज में कहा था, ‘‘पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और पंजाब में यूपीए एकजुट हो गया तो हम भाजपा नीत एनडीए को 2019 में बहुमत का आंकड़ा छूने नहीं देंगे।’’ इस बात का आधार यह है कि लोकसभा की कुल 543 में से 175 सीटें इन चारों राज्येां से आती है। 2014 में एनडीए ने यहां से 112 सीटें जीतीं जो लोकसभा में एनडीए की कुल ताकत का एक तिहाई है। बहरहाल, यह फाॅर्मूला तभी कारगर हो सकता है जब दो स्तरों पर महागठबंधन बने-पहला, इन चार अहम प्रदेशों के वे सभी दल एकजुट हो जांए जो एनडीए के बाहर है, दूसरा, बाकी प्रदेशों के लिए एक अन्य गठबंधन बने।

राज्यस्तर पर महागठबंधन बिखरा तो राष्ट्रीय स्तर पर इसे धराशाई होने से कोई रोक नहीं सकता। बहरहाल, भाजपा ने मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज की और विपक्षी दलों का उत्साह निराशा में बदला गया। उत्तर प्रदेश में महागठबंधन कारगर नहीं रहा। त्रिकोणीय मुकाबले में विपक्षी दलों को करारी शिकस्त मिली। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाला कांग्रेस-सपा गठबंधन बुरी तरह हारा। मायावती की बहुजन समाज पार्टी का तो उत्तर प्रदेश के राजनैतिक परिदृश्य से सफाया हुआ ही जान पड़ता है। नीतीश का बाद में एनडीए का हाथ थामना, पहले से ही चरमराए महागठबंधन पर अंतिम प्रहार साबित हुआ।

कांग्रेस गुजरात में भाजपा के हाथों भले फिर हार गई पर नतीजे पार्टी के लिए थोडे़ सकारात्मक संकेत लेकर आए और विपक्षी खेमें में आशाएं फिर से कुलबुलाने लगीं। जनेऊधारी ब्राह्मण होने के प्रमाण के साथ राहुल गांधी तिलक लगाकर पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से लबरेज तीन नौसिखिए साझीदारों हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के साथ चुनावी समर में उतरे। इस ‘मिनी-महागठबंधन’ में मंडल, कमंडल, दोनों ही एजेंडे को साथ-साथ जगह मिलती दिखी। लोकसभा चुनाव आज कराए जाएं तो नतीजे क्या होंगे? इसे समझने के लिए पहला परिदृश्य, यूपीए अगर अपने तीन मुख्य सहयोगियों सपा, बसपा और तृणमूल के बिना लडे़, तो उसे सिर्फ 102 सीटें मिलने की संभावना है। दूसरा परिदृश्य, यूपीए का इन तीनों सहयोगियों के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन हो जाए तो उसे 202 सीटें तक मिल सकती है। पहले परिदृश्य में एनडीए को 309 सीटें जबकि दूसरे परिदृश्य में 258 सीटें मिलने की संभावना है, जो बहुमत के 272 के आंकडे़ से कुछ ही कम है।

आज जबकि पंजाब में कांग्रेस की सरकार है और बिहार में नीतीश के पाला बदलने से समीकरण बदल चुके है, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल ही दो प्रमुख राज्य हो सकते है जहां गठबंधन हो जाने की सूरत में यूपीए के लिए संभावनाओं के द्वार खुलते है। यह संभावना वास्तविकता के कितने करीब दिखती है? क्या ममता और मायावती अपना अहंकार छोड़कर राहुल गांधी के साथ काम करने को राजी होगी जिन्हें वे राजनीति का नौसिखुआ मानती है? नवंबर 2017 में, सपा, बसपा और कांग्रेस अगले लोकसभा चुनावों के लिए क्रमशः 30,30 और 20 सीटों की साझेदारी के लिए सहमत होती दिखीं। सपा के एक वरिष्ठ नेता कहते है, ‘‘अखिलेश मुलायम नहीं है, वे मायावती को ‘बुआजी’ कहकर संबोधित करते है। बेशक उनका आपसी तालमेल बहुत अच्छा नहीं रहा है पर दोनों एक दूसरे का सम्मान करते है।

सपा-बसपा, दोनों अनुभव कर रही हैं कि उत्तर प्रदेेश के मौजूदा राजनैतिक हालात में दोनों ने समझौता न किया तो दोनों का सफाया है जाएगा’’ सोनिया गांधी की करीबी होने के नाते ममता इस गठबंधन की धुरी हैं उन्होंने संसद में विरोध प्रदर्शन के दौरान राहुल के साथ काम किया है और उनका मानना है कि अरविंद केजरीवाल को भी इस गठबंधन में शामिल किया जाना चाहिए सर्वे में ममता को लगातार दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रूप मं चुना गया। यूपीए साझेदारों को एकजुट करने में कामयाब रहा तो एनडीए अपने दम पर सरकार बनाने के लिए 272 सांसदों के जादुई आंकड़े से पीछे रह जाएगा। नवीन पटनायक के समर्थन और दक्षिण भारत में डीएमके सरीखे क्षत्रपों को साथ लाने से यूपीए के सीटों की संख्या बढ़ेगी। महागठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा, यह असहमति मुख्य मुद्दा बनेगा. ममता और मायावती जैसी दिग्गजों को अखिलेश या राहुल नेता के रूप में सहज स्वीकार न होंगे।

मौजूदा वक्त में यूपीए के लिए महागठबंधन की संभावना जितनी क्षीण दिखती है, आने वाले दिनों में जो राजनैतिक परिदृश्य बनेंगे वे और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। 2018 में राज्यों में होने वाले चुनाव, कांग्रेस के सामने चुनौतियों को अंबार खड़ा करने वाले हैं। पार्टी को कर्नाटक में सत्ता विरोधी कारक को मात देते हुए फिर से राज्य की सत्ता में वापसी करनी होगी। इसके अलावा उसे भाजपा शासित तीन राज्यों- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, जहां दिसंबर में चुनाव होने हैं- में से कम से कम दो को तो भाजपा से छीनना ही होगा। यदि कांग्रेस चारों राज्य हार जाती है तो 2019 के लिए सत्ता का संग्राम 2018 में ही खत्म हो जाएगा।

गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की है कि क्या वह दलितों, अल्पसंख्यकों, विद्रोही प्रभावशाली जातियों के वोटरों को एक साथ पिरोकर रखते हुए हिंदू मुख्यधारा के वोटों में सेंध लगा पाएगा, जिसे आकर्षित करने का प्रयास राहुल कर रहे हैं? इसका उत्तर इस पर निर्भर करता है कि गठबंधन कैसे और किस हद तक बिना बहुसंख्यक हिंदू वोटों को नाराज किए, एनडीए के हिंदुत्व एजेंण्डा भी देश के सामने रखना होगा जो वोटरों को लुभा सके और उन्हें गठबंधन के प्रति आकर्षित कर सके। संख्याबल बढ़ाने के अवसरवादी खेल और हर बात पर एनडीए का बस रस्मी विरोध कर देने से आगे की सोचते हुए यूपीए के महागठबंधन को एक कारण की भी जरूरत होगी।

सांप्रदायिकता बनाम गैर-सांप्रदायिकता का एजेंडा अब एक पिटा हुए फाॅर्मूला हो चुका है जो अंततः वोटरों को भाजपा के पक्ष में लामबंद कर देता है। महागठबंधन को स्पष्ट तौर पर देश के लिए एक वैकल्पिक आर्थिक नजरिया सामने रखना होगा, साथ ही उसे एक जिताऊ चुनावी रणनीति और पटकथा की भी जरूरत होगी। राहुल की अगुवाई वाली कांग्रेस अगर संगठन दुरूस्त कर ले, संघीय मोर्चे को फिर से ठीक करने की कारगर तरकीब खोज लाए, महागठबंधन सरीखे गठजोड़ बनाती जाए। तो एनडीए को सत्ता से बेदखल करना उसके लिए कोरी कल्पनाभर नहीं रह जाएगा।

About namste

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*