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एक साल के बाद आरबीआई के पूर्व गवर्नर ने तोड़ी चुप्पी

नई दिल्ली। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रहे रघुराम राजन ने एक वर्ष के बाद नोटबंदी पर आखिकार अपनी चुप्पी तोड़ ही दी राजन ने कहा कि उन्होंने कभी भी नोटबंदी का समर्थन नहीं किया बल्कि नरेंद्र मोदी सरकार को नोटबंदी के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। राजन ने कहा कि उन्होंने सरकार को चेताया था कि इस फैसले से अल्पकाल में होने वाला नुकसान लंबी अवधि तक भारी पड़ेंगे।

राजन ने यह सारी बातें अपनी किताब ‘I Do What I Do: On Reforms Rhetoric and Resolve’ (मुझे जो करना होता है, वह मैं करता हूं: सुधारों का शोरगुल और संकल्प) में कही हैं। राजन की किताब के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा उनकी असहमति के बावजूद उनसे इस मुद्दे पर नोट तैयार करने को कहा गया। आरबीआई ने नोट तैयार कर सरकार को सौंप दिए और इसके बाद इस पर निर्णय करने के लिए सरकार ने समिति बनाई। राजन ने खुलासा किया कि समिति में आरबीआई की ओर से सिर्फ करेंसी से जुड़े डिप्टी गवर्नर को शामिल किया गया, इससे जाहिर होता है कि राजन ने स्वयं इन बैठकों में हिस्सा नहीं लिया।

राजन ने कहा कि काले धन को सिस्टम में लाने का मकसद पूरा करने के दूसरे तरीके भी सरकार को सुझाए थे। उन्होंने फरवरी 2016 में मौखिक तौर पर अपनी सलाह सरकार को दी और बाद में आरबीआई ने सरकार को एक नोट सौंपा जिसमें उठाए जाने वाले जरूरी कदमों और इसकी समय-सीमा का पूरा खाका पेश किया गया था लेकिन सरकार ने नोटबंदी की राह चुनी। राजन की यह किताब इसी हफ्ते आने वाली है। जिसमें नोटबंदी के पर उन्होंने खुलकर अपनी बात कही। राजन ने लिखा कि ‘आरबीआई ने इस ओर इंगित किया कि अपर्याप्त तैयारी के अभाव में क्या हो सकता है।’

हालांकि सरकार ने नोटबंदी के फैसले का यह कहते हुए बचाव किया कि इससे टैक्स बेस बढ़ने से लेकर डिजिटल ट्रांजैक्शन में इजाफे तक कई दूसरे फायदे हुए हैं। राजन ने माना कि नोटबंदी के पीछे इरादा काफी अच्छा था लेकिन इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उन्होंने कहा, निश्चित रूप से अब तो कोई किसी सूरत में नहीं कह सकता है कि यह आर्थिक रूप से सफल रहा है। राजन ने आरबीआई गवर्नर का अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद बतौर फैकल्टी शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में वापसी की। राजन का कार्यकाल 5 सितंबर 2016 को पूरा हो गया था जबकि नोटबंदी की घोषणा 8 नवंबर 2016 को की गई।

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