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किसकी नजर लगी मोदी की प्रयोगशाला को

विकल्प शर्मा

नई दिल्ली। एक समय था जब गुजरात के पोरबन्दर को अपराधों का बड़ा गढ़ माना जाता था। तब वहां की तत्कालीन गृह मंत्री हरिन पण्डया ने एक अभियान चलाया और शराब, तस्करी एवं जिस्म फरोशी बड़ी रोक लगाई थी। पण्डया गुजरात में बैठे माफिया के लिये खतरा बन गये थे इनमे से कुछ मोदी मंत्री मण्डल में बैठे मंत्रियों के खास थे। शराबबंदी पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी लेकिन अभी हाल ही में गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन भाई पटेल एयरपोर्ट पर शराब के नशे में धुत पाये गये थे।

                हार्दिक ने कांग्रेस के पाले में डाली गेंद

हार्दिक पटेल के साथियों की गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी के साथ हुई बैठक ने गुजरात में एक नया विवाद छेड़ दिया है बीजेपी जहां बार-बार ये आरोप लगा रही थी कि पाटीदार आंदोलन कांग्रेस द्वारा प्रायोजित है, वहीं इस मीटिंग के बाद अब हार्दिक पटेल ने ये साफ कर दिया है कि अगर कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में पाटीदारों को आरक्षण देने की बात करती है तो पाटीदार कांग्रेस का समर्थन करेंगे।हार्दिक पटेल ने कहा कि बीजेपी ने पाटीदारों पर बहुत अत्याचार किया है।भरत सिंह सोलंकी मीटिंग के दौरान हार्दिक पटेल मौजूद नहीं थे। हार्दिक ने एक समाचार चैनल से बात करते हुए कहा कि पाटीदार आंदोलन किसी भी पार्टी से प्रायोजित नहीं है। हार्दिक ने कहा कि चुनाव के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही मायने रखता है, इसलिए वे कांग्रेस के साथ शुरुआत कर रहे हैं।हार्दिक पटेल ने कहा कि अगर कांग्रेस पाटीदारों के हितों की बात करती है तो पाटीदार कांग्रेस को वोट देंगे। जब तक कांग्रेस का घोषणा पत्र स्पष्ट नहीं होता, तब तक वे कुछ भी साफ तौर पर नहीं कहेंगे।

उसके बाद नगर निगम में शराब की पार्टी मनाते कुछ कर्मचारियों की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी। इसके बाद भारी मात्रा में तेल कनस्तरों में शराब की बोतले जब्त की गयी। जिनकी कीमत लगभग 50 लाख रूपये बताई जा रही है। बड़ा सवाल यह है कि जब गुजरात राज्य में शराबबंदी है तो इतनी बड़ी मात्रा में शराब कहां से आयी। सवाल यह है कि मोदी की इस प्रयोगशाला को किसकी नजर लग गयी है।

जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भाजपा ने लोकसभा चुनावों में हमेशा औसत से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन 2014 में उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद पार्टी ने राज्य की सभी 26 सीटों पर जीत का परचम लहराया। अब जब उत्तर प्रदेश में भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री की लोकप्रियता अपने शिखर पर है, आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए मोदी और मुख्यमंत्री विजय रूपानी की चुनौती कुछ हल्की दिखाई देती है। नवंबर 2015 में जिला और तालुका पंचायतों के चुनाव में ग्रामीण गुजरात में पार्टी को कांग्रेस के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा था और वह 70 फीसदी से ज्यादा सीटों पर हार गई थी मगर निगमों पर उसने अपना कब्जा बरकरार रखा था।

तो अड़चनें कायम है। उनमें से एक बड़ी अड़चन पटेलों के लिए आरक्षण के हिमायती नेता हार्दिक पटेल है। भाजपा की सरकार के खिलाफ उनका अभियान 2015 में पार्टी की हार के पीछे एक मुख्य वजह था। तब से पटेल का असर कुछ कम हुआ है, खासकर शिवसेना जैसी पार्टियों के साथ उनके पींगें लड़ाने की वजह से, पर कितना कम हुआ है, इस पर अटकल ही लगाई जा सकती है।
पटेल की लोकप्रियता का ग्राफ बीजेपी के लिए अहम है क्योंकि यही वह समुदाय है जिससे इन सारे वर्षों के दौरान पार्टी और संघ परिवार को ताकत मिलती रही है।भाजपा पटेल वोटों को कितनी अहमियत देती है, यह गुजरात की आर्थिक धूरी और पटेलों के गढ़ सूरत की प्रधानमंत्री की यात्रा से मिलता है। यहां उन्होंने इस समुदाय के लोगों की परियोजनाओं का उद्घाटन किया और एक दिन पहले 16 अप्रैल को 11 किमी रोड शो भी किया।
गुजरात की आबादी में पटेल तकरीबन 12 फीसदी है, पर वे राज्य में पिछले तीन दशकों में पार्टी की बढ़ोतरी की रीढ़ रहे है। पार्टी के एक नेता कहते है,‘‘पटेलों को रिझाने के लिए भाजपा मोदी को तकरीबन दूसरे सरदार पटेल के तौर पर पेश करते हुए उनके करिश्मे का इस्तेमाल कर रही है। सूरत में उनके कटआउट पक्के तौर पर यही इशारा कर रहे है, उनमें से कुछ तो 25 फुट से भी ज्यादा ऊंचे थे।’’
पटेल समुदाय के कई लोग हार्दिक की छाया से बाहर निकलकर वापस पार्टी की ओर लौट भी रहे है। इसका पहला इशारा तब मिला जब भाजपा ने पिछले साल मई में हुए उपचुनाव में तलाला विधानसभा सीट जीत ली, जो पिछले दो चुनावों से कांग्रेस के पास थी, और फिर जनवरी 2017 में हुए 10,000 गांवो के पंचायत चुनावों में से ज्यादातर में जीत हासिल की।
पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों ने पार्टी सिंबल पर नही, निजी तौर पर चुनाव लड़ा था और भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने अपनी-अपनी जीत के दावे किए थे, मगर जब भाजपा ने नए सरपंचों की बैठक बुलाई तो उसमें 8,000 सरपंच शामिल हुए जो इशारा था कि असल में कौन जीता था।यह फर्क इस बात से पड़ा है कि रूपानी ने हालात को बहुत होशियारी से संभाला है।
ऊपर से तो मुख्यमंत्री शांत नजर आते है, पर उन्होंने तरह-तरह की रणनीतियां अपनाकर पार्टी की ताकत में इजाफा किया। उन्होंने पार्टी और सरकार के बीच फासले को खत्म कर दिया और कानून और व्यवस्था की हालत में सुधार लाए।
उन्होंने सेवा सेतु सरीखे अपने अभिनव कार्यक्रम से जमीन से जुड़े मुद्दों को बुनियादी स्तर पर सुलझाने की कोशिश की और किसानों की समस्याओं पर ध्यान दिया।
जिस बात से सबसे ज्यादा मदद मिली, वह यह कि उनकी सरकार अब तक किसी भी घोटाले से बिल्कुल बेदाग है, जो अहम चुनाव से पहले भाजपा के लिए बड़े फायदे की बात है। हिंदुत्व समर्थकों को खुश करते हुए उन्होंने गोवध विरोधी कानून को और सख्त बना दिया है।
इसमें गाय की हत्या करने का जुर्म साबित होने पर किसी को भी 10 साल से लेकर ताउम्र कैद का प्रावधान किया गया है और साथ ही दिन ढलने से लेकर सुबह पौ फटने तक गुजरात में गायों को लाने-ले जाने पर पाबंदी लगा दी गई है।
इस पाबंदी का उल्लंघन करने वाले को कठोर दंड दिया जायगा। जिसमें उस गाड़ी को जब्त करना भी शामिल है जिसमें गायों को ले जाया जा रहा होगा।
मगर भाजपा के लिए तुरूप का पता नर्मदा बांध पर आधारित 12,000 करोड़ रूपए की वह सौनी योजना साबित हो सकती है, जिसके दूसरे चरण को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को समर्पित किया।
यह देश में नदियों को जोड़ने की अब तक की सबसे बड़ी परियोजना है। इसमें 2019 तक सौराष्ट्र इलाके की 115 नदियों को आपस में जोड़ने का लक्ष्य है और इसका दूसरा चरण देश को समर्पित किए जाने के साथ ही हार्दिक (जिन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर सौराष्ट्र के पटेलों के मन में जगह बना ली थी) के अभियान में जबरदस्त सेंध लगेगी क्योंकि इसका मुख्य फायदा इस इलाके के पटेल किसानों को ही मिलेगा।
हालांकि रूपानी ने कुछ लोक-लुभावन कदम भी उठाए हैं। अलबत्ता, उन्हें अपने विरोधियों या अपने साथी समूहों के दबाव में ऐसा करना पड़ा। मसलन, अवैध बूचड़खानों के खिलाफ अभियान चलाना या गुजरात के शराबबंदी कानून को और सख्त बनाते हुए और भी कड़ी सजाओं के प्रावधान के साथ नया कानून लाना।
इनसे सूबे में कारोबार की वृद्धि पर गंभीर असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।नया शराबबंदी कानून ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर के दबाव में लाया गया, जो सामाजिक और सियासी, दोनों मकसदों के साथ राज्य में शराब के खिलाफ एक अभियान की अगुआई कर रहे हैं।
इस कानून ने अलबत्ता खुद मोदी की उन कोशिशों को उलट दिया, जो उन्होंने 2008 में सूबे में कारोबार और पर्यटन के मौकों को बढ़ाने के इरादे से इस कानून को नरम बनाने के लिए की थी।गुजरात भाजपा के प्रवक्ता भरत पांड्या कहते हैं, ‘‘हम योजनाबद्ध ढंग से काम कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की भारी जीत के बाद रास्ता साफ है। इतना ही नहीं, रूपानी की योजनाओं का असर पड़ रहा है। हम बहुत अच्छे ढंग से गुजरात जीतेंगे। कांगे्स हमेशा की तरह हाथ मलती रह जाएगी।’’मगर भाजपा बेपरवाह नहीं रह सकती। विपक्षी कांग्रेस भी उत्साहित है।
पार्टी के प्रवक्ता मनीष दोषी कहते हैं, ‘‘भाजपा के दावों में हकीकत से ज्यादा प्रचार की तड़क-भड़क है। आपको जमीन पर असल हालात की थाह लेने के लिए हमारे सियासी कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी को देखना पड़ेगा। हाल ही में हमने सौराष्ट्र के भावनगर जिले की गरियाधार नगर पालिका की सभी आठ सीटें जीती हैं।
वह भी राज्य भाजपा के प्रमुख जीतू वघानी की ऐन नाक के नीचे, जो उसी इलाके के हैं।’’यह फर्क सचमुच देखा जा सकता है कि कांग्रेस एकजुटता के साथ काम कर रही है। पार्टी के चारों शीर्ष नेताओं-राज्य प्रमुख भरत सोलंकी, शंकरसिंह वाघेला, शक्तिसिंह गोहिल और सिद्धार्थ पटेल-ने हाथ मिला लिए हैं और नजदीकी तालमेल के साथ काम कर रहे हैं। पिछले दिनों आदिवासी मुद्दों को उठाने के मकसद से की गई पार्टी की नवसर्जन आदिवासी अधिकार यात्रा पर में लोगों की अच्छी भागीदारी देखने को मिली।
इसके अलावा पार्टी हार्दिक को भी गोला-बारूद मुहैया करवाने की कोशिश कर रही है ताकि भाजपा को सूबे में पटेलों के उसके मुख्य समर्थक समुदाय से दूर रखा जा सके।
मोदी की अगुआई में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा की एक के बाद एक जोरदार जीत के बावजूद कांग्रेस के वोट कभी 38 फीसदी से नीचे नहीं गए। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि 182 सदस्यों की विधानसभा में पार्टी की सीटें एक-तिहाई का आंकड़ा पार नहीं कर सकीं। उत्तर प्रदेश की भारी जीत के बाद गुजरात में भाजपा को बेशक बढ़त हासिल है।

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