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अन्नदाता पर लगाम

विकल्प शर्मा
नई दिल्ली। बारहवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही देश में विकास के लिए पांच साल का खाका खींचने की पंडित जवाहरलाल नेहरू के जमाने से चली आ रही स्वायत तब इतिहास के पन्नों में सिमट गई जब नीति आयोग ने 25 अप्रैल को देश की तरक्की का नया एजेंडा पेश किया, नई व्यवस्था में 15 वर्षीय विजन, सात वर्षीय रणनीति और तीन साल का एक्शन एजेंडा तैयार किया गया है, लेकिन वैसे ही आयोग और सरकार के बीच नीतिगत मतभेद उभरकर सामने आ गए।एक्शन एजेंडा पेश करते समय नीति आयोग से सदस्य बिबेक देबराॅय ने जोर देकर कहा कि देश की 65 फीसदी आबादी गांवो में रह रही है एक तरह से देखा जाए तो वह आबादी कर के दायरे से बाहर है अगर विकास परियोजनाओं के लिए टैक्स बेस बढ़ाना है तो कृषि आय को भी आयकर के दायरे में लाना होगा, जब उनसे पूछा गया किसानों पर कितनी आय के बाद आयकर लगाने का विचार है, तो उन्होनें कहा कि जिस आयवर्ग में भारत के बाकी नागरिक आयकर चुकाते है, वही बात किसानों पर भी लागू होगी, देबराॅय का बयान इसलिए खासा महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि देश के आजाद होने के बाद केंद्र सरकार ने जो सबसे बड़ा फैसला किया था, उसमें किसानों को लगान या किसी भी तरह के कर से मुक्त कर दिया गया था, किसानों का करमुक्त होना एक तरह से भारत की आजादी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, अगर सरकार किसानों पर आयकर लगाती है तो इसे अंग्रेजों के जमाने के लगान की वापसी माना जाएगा वैसे आयोग ने यह भी कहा है कि सरकार का लक्ष्य 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का है, इस सवाल पर कि क्या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों की कर्ज माफी से उनकी आमदनी बढ़ेगी, आयोग के सदस्य रमेश चन्द्र ने कहा, ‘‘ कर्ज माफी विकास का कदम नहीं है, यह सरकार की और से किसान की राहत देने के लिए उठाया गया एक कदम है, इसे कृषि विकास से जोड़कर नही देखा जा सकता,’’ ये बातें मीडिया का ध्यान खींचने वाली थीं। इस बात के सियासी महत्व को देखते हुए वित्त मंत्री अरूण जेटली ने अगले ही दिन इस तरह की किसी योजना का खंडन कर दिया, जेटली ने साफ कहा कि कृषि आय पर कर लगाने कर सरकार का कोई इरादा नहीं है लेकिन यहां सवाल उठता है कि पंचवर्षीय योजना को खत्म करने के बाद सरकार जो नया तंत्र विकसित करना चाहती है, उसको लेकर क्या सरकार और नीति आयोग के बीच कोई तालमेल नही है? या कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार अपने मन की बाद नीति आयोग के मुंह से कहलाकर जनता का मन टटोलना चाहती हो,तीन साल के एक्शन एजेंडा के बारे में नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगड़िया ने कुछ और बातें भी बताईं जो आगे चलकर विवादों को जन्म दे सकती है पानगड़िया ने कहा कि सरकारी उपक्रमों की बीमार इकाइयों की जमीन को बेचा जाएगा, उन्होनंे कहा कि रेलवे की जमीनों की भी बेचने का विचार है शहरों की आवास समस्या से निबटनें के लिए इमारतें बनाने के नियम सरल करने की बात भी एक्शन एजेंडा में कही गयी है उद्योग क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए कर्मचारियों से जुड़े प्रमुख कानूनों से सुधार किया जाएगा, यहां सुधार का आशय कर्मचारियों की छंटनी के नियम आसान करने से होता है,सरकारी कामकाज में बुनियादी बदलाव की सिफारिश करते हुए पानगाड़िया ने कहा, ‘‘सरकार की भूमिका नए सिरे से तय की जाएगी और उन कामों में सरकार की काई भूमिका नही होगी, जिनका जनता से सीधा सरोकार नहीं होगा जन उछेश्य वाली सेवाओं में सरकार की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया जायेगा,’’ ऐक्शन एजेंडा में 2018-19 में वित्तीय घाटे की 3 फीसदी और वित्त वर्ष 2019-20 से राजस्व घाटे को 0.9 फीसदी के स्तर पर लाने का लक्ष्य रखा गया है, एजेंडा के मुताबिक, इस तरह प्राप्त होने वाले अतिरिक्त राजस्व को स्वास्थ्य, सेवा, कृषि, ग्रामीण विकास, रक्षा, रेलवे रोड और पूंजी खर्च होने वाली दूसरी श्रेणियों को आवंटित किया जायेगा।यहां ध्यान रखना होगा कि नीति आयोग के पास राज्यों से अपनी बात मानवानें के वैसे प्रावधान नही है जैसे योजना आयोग के पास थे ऐसे में पंचवर्षीय योजना की तरह 15 वर्षीय विजन को लागू करना हर मायने में अलग जरूर होगा।

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